जमशेदपुर या बोलचाल में जिसे टाटा भी कहा जाता है, भारत की एक प्रसिद्द इस्पात नगरी है, जो राज्य की राजधानी रांची से 130 किमी दक्षिण की ओर तथा अपने निकटतम महानगर कोलकाता से ढाई सौ किमी पश्चिम में स्थित है। इस शहर का इतिहास कोई ज्यादा पुराना नहीं, बल्कि सिर्फ सौ साल का ही है, जबसे यहाँ जमशेदजी ने टाटा इस्पात उद्योग की नींव रखी। दक्षिणी झारखण्ड के पूर्वी सिंहभूम जिले में स्वर्णरेखा तीरे बसा यह एक मध्यम आकार का शहर है जिसकी आबादी दस लाख से अधिक है। यह झारखण्ड के सबसे बड़े विकसित क्षेत्रों में से एक है। एक समय जमशेदपुर का आदित्यपुर क्षेत्र लघु उद्योगों की संख्या के मामले में एशिया में दूसरा स्थान रखता था, जिसकी जगह अभी नॉएडा ने ले ली है। यहाँ देश के हर कोने के लोग मिल जायेंगे। सड़कों पर अन्य बड़े शहरों की तुलना में यहाँ का अपेक्षाकृत कम ट्रैफिक, बेहतर स्कूलों का होना और टाटा के बसाये इलाकों में उच्च स्तरीय नागरिक सुविधाएँ- ये वे कारण हैं जो लोगों को यहाँ बसने को प्रेरित करती हैं। अधिकतर लोग जो यहाँ कंपनी में काम करने आते है, यहीं के स्थायी निवासी बन जाते हैं।
बात जब घूमने-फिरने की हो, तो यह शहर आपको अपने पार्कों एवं झीलों से आकर्षित करने की कोशिश करता है। जमशेदपुर का जुबिली पार्क अत्यंत प्रसिद्द है, जिसका उद्घाटन देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरु ने कंपनी के सिल्वर जुबिली या पचासवीं वर्षगांठ के अवसर पर पचास के दशक में किया था। काफी बड़े भूभाग में फैले इस पार्क में एक बड़ी से झील है जिसे जयंती सरोवर कहा जाता है और यहाँ नौका विहार की भी सुविधा है।
जमशेदपुर का एकमात्र टाटा जूलॉजिकल पार्क या चिड़ियाघर भी जुबिली पार्क परिसर के अन्दर ही स्थित है।
जुबिली पार्क के अन्दर ही बना आधुनिक निक्को पार्क बच्चों के लिए ज्यादा खास है। इनके अलावा यहाँ अनेक छोटे-बड़े उद्यानों की भरमार है जिनमे भांति-भांति के पेड़-पौधे-फूल आदि लगे हुए हैं। नव वर्ष के अवसर पर तो यहाँ एक साथ एक लाख लोगों को पिकनिक मनाते देखा जा सकता है। लेकिन जिस समय इस पार्क की रौनक सबसे चरम पर होती है, वो समय होता है तीन मार्च के दिन, जिस दिन कम्पनी के संस्थापक जमशेदजी का जन्मदिन मनाया जाता है। इस अवसर पर जुबिली पार्क रंग-बिरंगे रोशनियों से जगमगा उठता है और एक हफ्ते तक लाखों लोगों की भीड़ रहती है, दुर्गा पूजा से भी कहीं बढ़कर। यही नहीं, बल्कि शहर के अन्य छोटे-छोटे पार्कों को भी खूब सजाया जाता है।
जुबिली पार्क के बाद शहर के मुख्य आकर्षण में जिसका नाम आता है वो है –डिमना लेक या झील। शहर की परिधि से थोडा बाहर स्थित यह एक विशाल झील है जो स्वर्णरेखा नदी से ही जुड़ा हुआ है। चारो ओर झारखण्ड के जंगलों-पहाड़ों से घिरे इस झील के नज़ारे काफी रमणीय है। सारे शहर और उद्योगों की जलापूर्ति यहीं से की जाती है। पिकनिक के समय इसका महत्व कई गुना बढ़ जाता है, दूर-दूर से लोग इकठ्ठे हो जाते है। लेकिन वहीँ दूसरी ओर इससे काफी गन्दगी भी फैलती है।
शहर के पूर्वी हिस्से में हुडको पार्क है जिसकी महिमा भी कुछ कम नहीं। जमशेदपुर का यह पूर्वी हिस्सा टाटा की ही एक अन्य कंपनी टेल्को या टाटा मोटर्स के इलाके में आता है, जो अत्यंत शांत और बिलकुल साफ़ सुथरा है। हुडको एक छोटा सा पार्क है जिसे एक पहाड़ी पर बनाया गया है। प्रवेश करते ही ऐसा लगता है जैसे किसी जंगल में प्रवेश कर रहे हों। छोटी सी पहाड़ी पर एक कृत्रिम झरना है, और आस पास सुन्दर पौधों-फूलों की क्यारियाँ। पार्क के दूसरी छोर पर एक छोटी सी झील भी है। यहाँ भी मुख्यतः पिकनिक के मौसम में खासा रौनक होता है। उपरोक्त वर्णित तीन मुख्य आकर्षणों के अलावा शहर के कदमा इलाके का भाटिया पार्क खरकई नदी तीरे एक छोटा सा उद्यान है जहाँ शाम बिताने लोग पहुचते हैं।
कदमा-सोनारी लिंक रोडएक ऐसा स्थान है जो वॉकरों तथा जोगरों का प्रिय है। दोनों ओर सड़क एवं लम्बे-लम्बे पेड़ों के मध्य एक फूटपाथ पर सुबह-शाम टहलना काफी सुकूनदायक होता है। दलमा की पहाड़ियों के बारे तो आपने सुना ही होगा। दलमा एक वन्य जीव अभ्यारण्य भी है जहाँ झारखण्ड की असली ख़ूबसूरती बसती है। अगर सड़क मार्ग से जाया जाय तो दलमा चोटी की दूरी लगभग चालीस किमी होगी, जबकि पैदल दूरी मात्र दस किमी है। खास बात यह है की दलमा की चोटी से पूरे जमशेदपुर शहर का नजारा देखा जा सकता है।
यूँ तो स्वर्णरेखा ही जमशेदपुर की जीवनदायिनी है, पर एक अन्य नदी भी है खरकई, जो समीप के सटे आदित्यपुर को जमशेदपुर से अलग करती है। यह आदित्यपुर सराइकेला जिले में है और लघु उद्योगों का गढ़ भी है, एक हजार से ज्यादा इस्पात सम्बन्धी लघु उद्योगों का अनुमान है, पर मंदी के कारण अधिकांश की स्तिथि ख़राब ही है। इन दोनों नदियों के संगम को दोमुहानी के नाम से जाना जाता है। बरसात के दिनों में तो दोनों नदियाँ काफी भयावह रूप धारण कर लेती हैं।
खरकई नदी के उग्र रूप को मैंने डूबते हुए भाटिया पार्क के रूप में अक्तूबर 2013 में देखा था।इसके अलावा सन 2008 में भी भीषण बाढ़ से जन-जीवन अस्त-व्यस्त हो चूका है, वैसे जमशेदपुर में बाढ़ आना काफी दुर्लभ ही है।
हर शहर में कुछ खूबियाँ होती है, तो कुछ कमियाँ भी होती हैं। शहर में स्कूल एक से बढ़कर एक हैं, वहीँ दूसरी ओर उच्च शिक्षा के मामले में शहर बड़ा गरीब है। आज तक यहाँ एक भी विश्वविद्यालय नहीं है, जिस कारण छात्रों को अन्य बड़े महानगरों की ओर रुख करना पड़ता है।
लेकिन हाँ, शहर का XLRI एक विश्वस्तरीय प्रबंधन संस्थान है, जिसने शहर का मान रखा हुआ है।
साथ ही राष्ट्रीय प्रोद्योगिकी संस्थान या NIT जमशेदपुर भी देश के अग्रणी इंजीनियरिंग संस्थानों में गिना जाता है। मनोरंजन के साधनों की यहाँ मुझे हमेशा कमी खलती है। पार्कों के अलावा यहाँ सिर्फ गिने चुने सिनेमा ही है। महानगरों की भांति यहाँ अधिक विकल्प नहीं हैं। एक और समस्या सड़कों पर यातायात सम्बन्धित है। यहाँ बसें बहुत कम चलती है, जिससे ऑटो रिक्शा वालों पर ही निर्भर रहना पड़ता है। ऑटो वाले अपनी मर्जी के हिसाब से सड़क पर कहीं भी गाड़ी खड़ी कर अन्य लोगों के लिए परेशानी पैदा करते हैं। रेलमार्ग तो यहाँ काफी विकसित है किन्तु हवाई अड्डा काफी छोटा है। आज के समय यहाँ भी एक बड़े हवाई अड्डे की जरुरत महसूस की जा रही है। झारखण्ड की जीवन रेखा कही जाने वाली राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 33 या NH33 भी जमशेदपुर होकर गुजरती है लेकिन इसकी हालात वर्षो से दयनीय है।
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