झारखण्ड न सिर्फ खनिज-खदानों से भरा पड़ा है, बल्कि यहाँ भी एक से बढ़कर एक अछूते रमणीय स्थल मौजूद हैं, जो की पर्यटन के लिहाज से अब तक अधिक विकसित नहीं हो पाएं हैं। कल्पना कीजिये की अपने ही राज्य में अगर एक ऐसी जगह हो, जहाँ दिन की दुपहरिया में भी बादल पर्वतों को छूते नजर आएं और शाम ढलते ही बरसकर सारी फ़िज़ा को तरो -ताज़ा बना दे, तो फिर क्या दार्जिलिंग और क्या शिमला, सब इधर ही खींचे चले आएंगे। जिसका आज जिक्र करूँगा वह भी एक हिल स्टेशन के तौर पर अब तक देशवाशियों तो क्या, स्थानीय लोगों के लिए भी अछूता ही है, लेकिन हाँ, जैनियों का तीर्थ जरूर है जहाँ देश के कोने कोने से वे अपने तीर्थंकरों का दर्शन करने आते हैं, और वो है झारखण्ड की 4500 फ़ीट पर सबसे ऊँची चोटी- पारसनाथ की पहाड़ी। जैन धर्म के तेइसवें तीर्थंकर पार्श्वनाथ , जिन्होंने कुछ हजार बर्षों पहले अपने बीस साथी संतों के साथ यहाँ समाधी ली और उन्ही के नाम पर इसका नाम पड़ा पारसनाथ । जैन धर्म के सबसे पहले तीर्थंकर थे ऋषभ मुनि और चौबीसवें एवं अंतिम थे महावीर । यही कारण है की पारसनाथ जैन धर्म के सबसे बड़े तीर...
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