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चिड़ियाटापू और मुंडा पहाड़ तट: समंदर में पहाड़ों पर सूर्यास्त! (Chidiyatapu and Munda Pahad Beach: Sunset in the hilly ocean)

                   इस पोस्ट के शीर्षक को पढ़ आपको लग रहा होगा की कहीं मैं यूँ ही दिल बहलाने के लिए तो ऐसा नहीं लिख रहा? भला समुद्र में भी कहीं पहाड़ हो सकता है क्या? हमारा देश ही भला ऐसा है की ऐसे पोस्ट लिखने को मैं मजबूर हो जाता हूँ! अंडमान यात्रा अब समाप्ति की ओर है और आज दसवां और आखिरी दिन हैं। लगभग सारे मुख्य दर्शनीय स्थल, ऐतिहासिक स्मारक जैसे की सेल्युलर जेल तथा चाथम आरा मिल, और द्वीपों जैसे की ,नार्थ बे, रॉस, नील, हेवलॉक, रॉस एंड स्मिथ, बाराटांग, जॉली बॉय आदि के भी दर्शन हो चुके हैं। आज आखिरी दिन जिसे देखने मैं जा रहा हूँ वो पोर्ट ब्लेयर शहर से करीब एक ही घंटे की दूरी पर है।

मुंडा पहाड़ तट 
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***अंडमान के अन्य पोस्ट***

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  2. चिड़ियाटापू और मुंडा पहाड़ तट: समंदर में पहाड़ों पर सूर्यास्त! (Chidiyatapu and Munda Pahad Beach: Sunset in the hilly ocean)
  3. वंडूर तट और दुनिया के सबसे अच्छे कोरल रीफ वाला जॉली बॉय द्वीप (Wondoor Beach and Jolly Bouy Island: One of the best Coral Reefs of the World)
                                             
  पोर्ट ब्लेयर से तीस किमी दक्षिण स्थित है चिड़ियाटापू। टापू कहने का ये मतलब नहीं की यह भी कोई द्वीप ही होगा और फिर से मुझे कोई नाव पकड़ कर ही जाना पड़ेगा। पोर्ट ब्लेयर जो की खुद एक बहुत बड़ा टापू है, उसी के एकदम दक्षिणी छोर पर जो इलाका है उसे ही चिड़ियाटापू नाम दिया गया है। मैंने पहले ही कहा है की अंडमान में बसों का नेटवर्क बहुत बढ़िया है और चिड़िया टापू जैसे जगहों पर जाने के लिए भी सुबह पांच बजे से हर एक एक घंटे में नियमित बस की सुविधा है। परन्तु चिडियाटापू सुबह नहीं, बल्कि शाम को देखने वाली जगह है, इसलिए जल्दी जाकर कोई फायदा भी नहीं। 
                                             यात्रा के आखिरी दिन मेरे पास चिड़ियाटापू के अलावा कुछ खास कार्यक्रम नहीं था। चिड़ियाटापू में सूर्यास्त देखने के लिए भी शाम को ही जाना था, मेरी जानकारी में दोपहर दो बजे तक लोग चिड़िया टापू पहुँचने लगते हैं। सूर्यास्त के अलावा वहां एक जैविक उद्यान भी है जहाँ द्वीपीय वनस्पतियों और जीव-जंतुओं को देखने में काफी मदद मिल सकती है। आम तौर पर लोग ये उद्यान घंटे भर देखने के बाद पास ही स्थित समुद्र तट यानि मुंडा पहाड़ तट की तरफ प्रस्थान करते हैं। 

                                    सुबह से दोपहर तक होटल के कमरे में होने वाली बोरियत मिटाने के लिए इधर-उधर बाजार में टहलता रहा। बस स्टैंड भी पास ही था। एक-एक घंटे में चिड़ियाटापू की बस थी। मुझे लगा की दो बजने का इंतज़ार करना मुझसे नहीं हो पाएगा, पहले ही वहां पहुँच जाता हूँ। दस बजे वाली बस खड़ी थी। पर ये भी कुछ ज्यादा ही हड़बड़ी हो जाती। गर्मी तो अंडमान में खूब थी, वहां जाकर उमस भरे मौसम में कहीं बेचैनी न महसूस हो। सूर्यास्त तो पांच बजे के बाद ही होनी थी। फिर भी, आख़िरकार मुझसे और रहा नहीं गया, और मैंने सुबह ग्यारह बजे की बस पकड़ ही ली। 
                       चार-पांच किमी बाद पोर्ट ब्लेयर का शहरी हिस्सा धीरे-धीरे कम सा होने लगा, गाँव जैसे इलाके दिखने शुरू हो गए। नारियल के पेड़ों से भरपूर। बिलकुल भी न लगता की हम किसी द्वीप में हैं, जब तक समंदर न दिख जाये। लोकल बसों में लोकल लोगों की ही भीड़ रहती है, जबकि पर्यटक अधिकतर प्राइवेट गाड़ियों में ही घुमा करते है। एक घंटे में बस ठीक चिड़ियाटापू के बस स्टॉप पर आकर रुक गयी, यही आखिरी स्टॉप भी था, वापस पोर्ट ब्लेयर जाने के लिए मुड़ भी गयी। 

                       बस स्टॉप पर एक बोर्ड लगा था- बांयीं तरफ जैविक उद्यान, आगे मुंडा पहाड़ तट और फारेस्ट रेस्ट हाउस। सबसे पहले मैं जैविक उद्यान की ओर मुड़ा। यहाँ टिकट की एक काउंटर है, पर टिकट शायद दस रूपये का रहा होगा। अचानक बायीं ओर मुझे एक ह्वेल मछली की खोपड़ी की कंकाल रखी दिखी। सफ़ेद रंग का बहुत बड़ा कंकाल था। टिकट लेकर उद्यान के अंदर प्रवेश किया, लिखा था- इस उद्यान के पैदल चक्कर लगाने में करीब चालीस मिनट लगेंगे। वैसे बैटरी से चलने वाले ऑटो की व्यवस्था भी यहाँ है, पर अभी तक एक भी पर्यटक के न आने के कारण वे चलते हुए दिख न रहे थे। 

                        खैर, पैदल चलना शुरू करते हैं। इस उद्यान में जिस प्रकार के जीवों को रखा गया है, वैसे जीव भारत के किसी अन्य उद्यान में नहीं मिल सकते क्योंकि यहाँ सिर्फ अंडमान और कुछ पडोसी देशों के द्वीपीय जलवायु वाले समुद्री जीवों को ही रखा गया है, जिन्हे किसी दूसरे जलवायु वाले जगह नहीं रखा जा सकता। सबसे पहले मुझे खारे पानी वाले मगरमच्छ के दर्शन हुए। अधिकतर जीवों के नाम तो अंग्रेजी में होने के कारण सारे के नाम अभी मुझे याद नहीं, पर चित्रों में आप जरूर देख सकते हैं। पेड़ों में जंगली अमरुद और जंगली नीम के पेड़ बड़े रोचक लगे। इनका भी कोई जंगली वर्जन होता है। पर ये शायद अमरुद के पेड़ न थे, सिर्फ नाम ऐसा था। 

                         आगे चलता गया। कुछ पक्षियों के नाम थे,पर पक्षी दिखाई नहीं दिए। अचानक मेरी नजर पड़ी इंडोनेशिया के विशालकाय कोमोडो ड्रैगन सरीखे एक जीव की जो उसी समूह का प्राणी है, लेकिन ये जरा छोटा था। ड्रैगन बड़े आकर के छिपकलियों को कहा जाता है, पर अभी तक इन्हें सिर्फ डिस्कवरी चैनल पर ही देखा था। जीवों के अलावा यहाँ और भी बहुत तरह के पेड़ पौधे लगे थे, जिन्हे आप चित्रों में देख सकते हैं। सबसे अंत में हिरणों का एक बड़ा सा झुण्ड दिखाई पड़ा। एक ग्रीन हाउस भी यहां है जिसके अंदर कुछ पौधों को रखा गया है।
 
                       एक चक्कर काटने के बाद उद्यान से बाहर निकला तो दोपहर के दो बजे थे। आस-पास कुछ ढाबे थे। नारियल पानी अंडमान के काफी अच्छे होते हैं। आबादी इधर नाम मात्र की ही थी। मेरे सिवाय अभी तक कोई भी पर्यटक हाजिर नहीं हुआ था। जैविक उद्यान से मुश्किल से आधे किमी दूरी पर मुंडा पहाड़ तट जाने के रास्ते में ही दायीं ओर एक छोटा सा पार्क बना हुआ है, जो थोड़ी ऊंचाई पर स्थित है। यहाँ से पुरे समुद्र तट का नजारा दिखाई देता है और आप आसानी से बैठकर घंटों गुजार सकते हैं। कुछ लोग चिड़ियाटापू में रात भी गुजारते हैं, जिसके लिए वन विभाग का फारेस्ट रेस्ट हाउस "वनस्थली" भी यहाँ बना हुआ है। समुद्र के अंदर यहाँ छोटी सी पहाड़ी भी है, जिनके पीछे सूरज छिप जाता है, इस प्रकार सूर्यास्त काफी सुन्दर दिखाई पड़ता है। एक साथ समुद्र और पहाड़ दोनों के साथ अद्भुत सूर्यास्त के दर्शन होते हैं। 

                             कुछ घंटे इस पार्क में बैठने के बाद पर्यटकों का आगमन शुरू होने लगा। सूर्यास्त होने में अभी एक घंटा बाकि था। मैंने मुंडा पहाड़ तट की तरफ बढ़ना शुरू किया, बस कुछ सौ क़दमों की दूरी पर। यह एक चट्टानी तट है। पानी का रंग तो बिल्कुल साफ़ ही है, पर नीलापन एकदम फीका सा है, पर पोर्ट ब्लेयर का सबसे बढ़िया तट इसे ही कहा जा सकता है। सूर्यास्त होते ही लोगों का हुजूम उमड़ पड़ा, फोटोग्राफी का दौर शुरू हो गया। मुझे नील द्वीप के लक्ष्मणपुर तट वाले सूर्यास्त की याद आ गयी। बस फर्क यही था की वहां समुद्र में कोई पहाड़ नहीं था, और यहाँ पहाड़ थे। सूरज के अस्त होते ही पर्यटकों का छंटना शुरू हो गया, फिर भी जाने का दिल तो नहीं था, पर यहाँ अधिक समय बिताने के चक्कर में कहीं देर शाम बस न मिली तो आफत हो जायगी, अगली सुबह वापसी की फ्लाइट भी थी, इसलिए मैंने धीरे-धीरे बस स्टॉप की ओर कदम बढ़ाना शुरू कर दिया। 

         दस दिनों की यह अनोखी अंडमान यात्रा अब खत्म होती है, अगले दिन यानि 18 मार्च की सुबह आठ बजे मेरी पोर्ट ब्लेयर से कोलकाता की फ्लाइट है। अगले पोस्ट में मैं पुरे अंडमान यात्रा के कार्यक्रम बारे एक संक्षिप्त जानकारी दूंगा और बताऊंगा की अंडमान घूमने के खर्चे को कम कैसे किया जा सकता है। 






































 ग्रीन हाउस 


























सूर्यास्त कुछ ऐसा था---



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Comments

  1. RD bhai, aapka post padha bahut acha laga, dil khus ho gaya,

    ReplyDelete
    Replies
    1. धन्यवाद अभयानंद जी

      Delete
  2. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (14-05-2017) को
    "लजाती भोर" (चर्चा अंक-2631)
    पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

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    Replies
    1. शुक्रिया शास्त्री जी

      Delete
  3. very nice post, you have given lots of information in this blog

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