Skip to main content

अंडमान ट्रंक रोड: समंदर से गुजरने वाले हाईवे पर सफर-पोर्ट ब्लेयर से डिगलीपुर (Andman Trunk Road: Highway which crosses the sea-Port Blair to Diglipur)

अंडमान यात्रा में अधिकतर पर्यटक अपने कार्यक्रम में सिर्फ दक्षिणी अंडमान- पोर्ट ब्लेयर, नील एवं हेवलॉक को ही शामिल करते हैं, अधिक से अधिक मध्य अंडमान के बाराटांग स्थित चूने पत्थर की प्राकृतिक गुफाएं देखने जा सकते हैं। परन्तु खूबसूरती के मामले में अंडमान का उत्तरी हिस्सा भी कोई कम नहीं, पर पोर्ट ब्लेयर से काफी दूर (तीन सौ किमी से अधिक) होने के कारण ये जगह देखने के लिए तीन-चार दिनों का अतिरिक्त समय चाहिए जिस कारण लोग इसे शामिल नहीं कर पाते।

अंडमान ट्रंक रोड: हाईवे (NH4) पर समुद्र 
 
***अंडमान के अन्य पोस्ट***

  1. शुरुआत अंडमान यात्रा की...  ( Trip to Andman: Jamshedpur-Kolkata to Port Blair)
  2. अंडमान यात्रा: सेल्युलर जेल (Trip to Andman: Cellular Jail)
  3. अंडमान यात्रा: लकड़ियों की जादूगरी- चाथम आरा मील और कोर्बिन तट (Chatham Saw Mill and Corbyn's Cove Beach- Port Blair)
  4. अंडमान यात्रा: नार्थ बे तट और भूतपूर्व पेरिस ऑफ़ ईस्ट- रॉस द्वीप (North Bay and Ross Island, Port Blair)
  5. अंडमान यात्रा: नील द्वीप पर पैदल भ्रमण- एक नीला एहसास (Neil Island- A Blue Heaven)
  6. नील से हेवलॉक- रंग-बिरंगा राधानगर तट (Neil to Havelock- The Colourful Radhanagar Beach)
  7. अंडमान ट्रंक रोड: समंदर से गुजरने वाले हाईवे पर सफर-पोर्ट ब्लेयर से डिगलीपुर (Andman Trunk Road: Highway which crosses the sea-Port Blair to Diglipur)
  8. रॉस एंड स्मिथ- जुड़वाँ टापू पर दो समुद्र तटों का मिलन (Ross and Smith Twin Island- Meeting of two sea beaches)  
  9. अंडमान का कार्यक्रम कैसे बनायें? (How to plan Andman Trip)
  10. चिड़ियाटापू और मुंडा पहाड़ तट: समंदर में पहाड़ों पर सूर्यास्त! (Chidiyatapu and Munda Pahad Beach: Sunset in the hilly ocean)
  11. वंडूर तट और दुनिया के सबसे अच्छे कोरल रीफ वाला जॉली बॉय द्वीप (Wondoor Beach and Jolly Bouy Island: One of the best Coral Reefs of the World)
  12. रंगत की काली रात और सुबह बाराटांग में चूने पत्थर की सफ़ेद गुफाएं (Night stay at Rangat and Lime Stone Caves of Baratang)                 
अगर आप चाहें तो पोर्ट ब्लेयर से डिगलीपुर समुद्री मार्ग द्वारा भी जा सकते हैं, इसके लिए सिर्फ सरकारी फेरी की सुविधा है, और दूरी भी सड़क मार्ग की तुलना में थोड़े कम समय में ही तय हो जाएगी। फ़िलहाल जलमार्ग आठ घंटे और सड़क मार्ग दस घंटे का समय लेता है। सड़क मार्ग चुनने का कारण यह था की यह सड़क यात्रा अंडमान को जरा और करीब से जानने और समझने मौका देने वाली थी, जबकि जलमार्ग से जाने पर बहुत सारी चीजों से वंचित होना पड़ता। 
                       दक्षिणी अंडमान के पोर्ट ब्लेयर से उत्तरी अंडमान के सबसे आखिरी शहर डिगलीपुर की दूरी करीब 325 किमी है। दोनों शहरों को जोड़ने वाली पूरे अंडमान की सबसे बड़ी यह सड़क कहलाती है- अंडमान ट्रंक रोड (NH-223), बोलचाल की भाषा में ATR भी कहा जाता है। जरावा नामक आदिम जनजातियों के बारे अपने जरूर सुना होगा, और यह हाईवे भी उनके जंगल से होकर ही गुजरती है। 

अंडमान में कुल मिलाकर छह किस्म के आदिवासी है-  जरावा (Jarava), ओंग (Onge), सेंटीनेलिज (Sentinelese), ग्रेट अंडमानीज (Great Andamanese), शोम्पेन (Shompen) और निकोबारी (Nicobarese)। जरावा इनमें से सबसे आसानी से देखे जा सकते हैं। एक समय जरावा जनजातियों को देखने के लिए पर्यटक उनके करीब तक चले जाते थे, उनके साथ फोटो खिंचवाते थे, उन्हें खाने-पीने की वस्तुएं भी दे देते थे। कभी-कभी जरावा भी पर्यटकों पर हमला कर देते थे। लेकिन एक बार किसी विदेशी ने इन नग्न जारवाओं के वीडियो बनाकर यूट्यूब पर डाल दिया, काफी बवाल मचा इसपर। तब से भारत सरकार ने इन जारवा क्षेत्रों से गुजरने हेतु कुछ कायदे-कानून बनाये।

जरावा क्षेत्र से गुजरने के लिए नियम-कानून

इन जंगलों पर सुरक्षा कवच बढ़ा दी गयी, और सभी तरह के वाहनों को कॉन्वॉय में गुजारा जाने लगा, चेक पोस्ट बनाये गए, दो पहिए वाहनों पर रोक लगाया गया। तब से रोजाना सुबह छह बजे, नौ बजे, बारह बजे और तीन बजे ही गाड़ियां गुजर सकती है, बाकि समय सभी गाड़ियों को चेक पोस्ट पर रुककर इंतज़ार करना पड़ता है। डिगलीपुर से पोर्ट ब्लेयर की ओर वापस  आने वाली गाड़ियों पर भी यह नियम लागू होता है और उनके कॉन्वॉय का समय इधर वाले कॉन्वॉय के समय से आधा घंटा आगे चलता है जैसे की- साढ़े छह बजे, साढ़े नौ बजे आदि। सभी गाड़ियों को निर्देश दिया जाता है की वे आपस में अधिक दूरी बनाकर न चलें, गाडी बिल्कुल न रोकें, किसी भी जरावा को गाड़ी में न चढ़ाये। गाड़ियों के आगे-पीछे पुलिस दल भी साथ-साथ चलती है।

                        
 बाराटांग, रंगत, मायाबंदर और डिगलीपुर- ये सभी अंडमान ट्रंक रोड पर हैं। मायाबन्दर जरा सा हटके है। पोर्ट ब्लेयर से डिगलीपुर जाने के लिए सरकारी और प्राइवेट दोनों तरह की बसें चलती है, लेकिन सरकारी बसें किफायती भी हैं और अच्छी भी, समय की बिल्कुल पाबंद। सरकारी बसों की टिकट दस दिन पहले तक खरीदी जा सकती है। मेरे पास दो विकल्प थे- पहले दिन सीधे डिगलीपुर तक पहुंचना, वापसी में रुक-रुक कर रंगत-बाराटांग वगैरह देखना, दूसरा विकल्प इसका ठीक उल्टा था। लेकिन जिस दिन मुझे जाना था, वो दिन सोमवार था, सोमवार को बाराटांग की चूने पत्थर वाली गुफाएं बंद रहती है, इस कारण पहले दिन मैंने सीधे डिगलीपुर जाने का निर्णय लिया। दो दिन पहले ही मैंने पोर्ट ब्लेयर बस स्टैंड पर डिगलीपुर की टिकट ले ली थी जिसकी कीमत थी दो सौ पैंसठ रूपये और बस का समय था सुबह चार बजे तड़के! 

                                    जैसा की मैं पहले कह चुका हूँ की यहाँ सूरज बहुत जल्दी उग जाता है जिस कारण दिन की शुरुआत भी बहुत पहले हो जाती है। एकदम तड़के सुबह उठना मेरे लिए एक बहुत ही मुश्किल काम है, फिर भी यहाँ आकर चार-पांच दिनों में आदत लग चुकी थी। घुमक्क्ड़ी के अलावा कोई और काम होता तो शायद इतनी सुबह उठ पाना किसी दंड जैसा लगता! चार बजे सुबह की बस पकड़ने के लिए पौने तीन बजे से लेकर सवा तीन बजे के बीच मोबाइल पर तीन-चार अलार्म लगा डाले! पर नींद कहाँ! ढाई बजे ही नींद टूट गयी। गर्मी तो लगनी ही थी, ज़िन्दगी में पहली दफा इतनी जल्दी नहा भी लिया और निकल पड़ा बस स्टैंड की ओर !

                                    अंडमान की बसें बिल्कुल समय की पाबंद होती है, ऐसा सुना था और यहाँ देख भी रहा था। ठीक चार बजे ही बस हाज़िर भी हो गयी। डिगलीपुर की यह पहली बस थी, कुछ और बसें भी थीं अधिकतम सुबह सात बजे तक। सुबह चार बजे से पहले से ही लोग अपनी-अपनी बसों का इंतज़ार कर रहे थे, पर ये स्थानीय लोग थे, शायद ही कोई पर्यटक रहा होगा। सूरज अभी ऊगा भी न था, और बस रवाना हो गयी। अँधेरे में अभी तो कुछ दिख भी न रहा था, पर हवा बिल्कुल ठंडी लग रही थी। सड़क पर ट्रैफिक न होने के कारण तेजी से भाग रही थी। एक घंटे में पोर्ट ब्लेयर से पचास किमी बाद ज़िरकातांग पोस्ट आया, और बस रुक गयी। धीरे-धीरे और भी गाड़ियां एक-एक कर पीछे लगती गयीं। यह जिरकातांग पोस्ट जरावा क्षेत्र में प्रवेश करने का पहला द्वार है, और सभी गाड़ियां सुबह छह बजे वाले पहले कॉन्वॉय के इंतज़ार में थीं। आगे पुलिस का पहरा भी था। 

           ठीक छह बजे कॉन्वॉय शुरू हुआ और गाड़ियां बढ़ने लगीं। अंदर प्रवेश करते ही घने-घने जंगल आ गए। कोई मानव बस्ती या घर नजर नहीं आ रही थी। समुद्री क्षेत्रों में मुख्यतः नारियल-केले के पेड़ अपने देखे होंगे, लेकिन यहाँ न जाने कितने तरह के पेड़-पौधे हैं, यह बताना मुश्किल है। सड़क सिंगल लेन ही है, पर उतनी अच्छी भी नहीं है की बस बिना झरझराए चल पाए! इस जंगल से बस इतनी उम्मीद थी की किसी तरह एक-दो जरावा दिख जाएँ और हमारा गुजरना सफल हो जाय! सुनसान जंगलों में मन कहीं खो गया, पर अचानक सड़क किनारे कुछ काली त्वचा वाले बच्चे और महिलाएं दिख पड़ीं! तुरंत दिमाग ठिकाने पर आया और समझ गया की  यही तो वो जरावा हैं जिन्हे देखने के लिए हम तरस रहे हैं! भीषण जंगलों के अंदर वे क्या करते और खाते-पीते हैं, ये तो रहस्य है, पर आज तक मुख्य धारा से जुड़ न पाए हैं। यूँ ही जंगलों में न जाने क्या-क्या चुनते रहते हैं! जरावा का एक छोटा सा समूह देखने के बाद आगे और कहीं दूसरा समूह दिखाई न दिया,  पर सौभाग्य से एक ही दिखा तो! आजकल जरावा आसानी से दीखते भी नहीं। 

                                जरावा के जंगलों में पचास किमी तक गुजरने के बाद अगला पड़ाव है- मिडिल स्ट्रैट जेट्टी (Middle Straight Jetty). यह कुछ और नहीं बल्कि इस हाईवे पर समुद्र की जो पहली धारा गुजरती है, उसे पार करने के लिए यहाँ जेट्टी बना हुआ है। हर पंद्रह मिनट पर बड़े से जहाज में यात्रियों और गाड़ियों को लादकर उसपार ले जाया जाता है। हर यात्री से इसके लिए आठ रूपये वसूले जाते हैं। उसपार की जेट्टी का नाम है- बाराटांग जेट्टी जहाँ लाइम स्टोन की गुफाएं देखने के लिए लोग जाते हैं। एक जहाज में तीन-चार बसें आसानी से लोड हो जाती हैं, यह देखना भी कोई कम दिलचस्प नहीं। वैसे यहाँ जलधारा की चौड़ाई एक किमी से कम ही होगी, और इसपर भी एक पुल तो बनाया ही जाना चाहिए, पर न जाने कब तक ऐसे जहाज में लादकर पार करना चलता रहेगा!
                    दस-पंद्रह मिनट में जलधारा पार कर हम बाराटांग जेट्टी पर आये, यही से लाइम स्टोन की प्राकृतिक गुफाएं जाने के लिए नाव के टिकट काउंटर बने हैं, पर आज बंद रहने के कारण सब सूना-सूना सा था। काफी देर से घर फोन नहीं लगाया था, देखा की एयरटेल, वॉडाफोन सभी गायब हैं, सिर्फ बीएसएनएल का नेटवर्क मिल रहा। जहाज से सभी यात्री उतरे, बस को भी उतारा गया, दुबारा आगे बढे। बाराटांग द्वीप पर अगले छत्तीस किलोमीटर तक जरावा के जंगल कायम ही रहते हैं, उसके बाद फिर से एक दूसरी जलधारा पार करनी पड़ती है। इसे गाँधी घाट का नाम दिया गया है। फिर से सभी यात्रियों को उतारा जाता है, जहाज पर बसों को चढ़ाया जाता है, धारा पार करने में यहाँ भी दस-पंद्रह मिनट का समय लगता है। यहाँ उस पार की जेट्टी का नाम है- उत्तरा जेट्टी।

                     उत्तरा जेट्टी पर जरावा क्षेत्र समाप्त होता है, अब कोई रोक-टोक नहीं होती, जहाँ मन वहां रुक सकते हैं। अब हम सब मध्य अंडमान में हैं। उत्तरा से सत्तर किलोमीटर दूर मध्य अंडमान का मुख्य शहर रंगत है। रंगत में भी घूमने को कुछ तट, मैन्ग्रोव वाक आदि है, सभी डिगलीपुर रोड पर ही हैं। रंगत एक छोटा शहर है, चालीस-पचास हजार की आबादी होगी, बाजार भी है, कुछ होटल व् लॉज भी हैं। पर अभी तो यहाँ रुकने का कोई इरादा था नहीं, डिगलीपुर से वापस आते समय रंगत में एक रात रुकना था।

                               रंगत से कुछ आगे एक ढाबे पर बस रुकी। एक दक्षिण भारतीय शैली का खाना परोसा गया, जब तक कहा न जाय खाना इधर मछली-भात ही मिलेगा। अभी दोपहर के बारह बजे थे, डिगलीपुर पहुँचने में कम से कम तीन घण्टे और लगने थे। रंगत से सत्तर किमी आगे मायाबंदर है, लेकिन यह बस मायाबंदर नहीं गयी, हाईवे से आठ किमी अंदर है मायाबंदर, कुछ बसें मायाबंदर होकर भी जाती हैं। मायाबंदर में भी कुछ तट हैं देखने लिए, उतना समय न था, कोई कार्यक्रम नहीं था उन्हें देखने का।

                              अंडमान ट्रंक रोड पर सफर करना पुरे अंडमान को जी लेने का सुकून दे रहा था- दक्षिण से उत्तर तक। यहाँ भाषा की भी कोई दिक्क्त नहीं, हिंदी प्रचलित भाषा है, मेरे अगल-बगल बैठे स्थानीय लोगों से काफी बातचीत हुई, जो जन्म से अंडमान  में ही है, आजतक कभी मुख्य भूमि नहीं गए। अंडमान में रहने वालों को किन-किन दिक्कतों का सामना करना पड़ता है, और कौन-कौन से कारण उन्हें यहाँ रहने को प्रेरित करते हैं, यह सब जानना दिलचस्प था। अगर किसी को कोई गंभीर बीमारी हुई, तो वे प्रायः चेन्नई चले जाते हैं, उच्च शिक्षा के लिए भी मुख्य भूमि ही जाना पड़ता है। बाकि सभी छोटी-मोटी जरूरतें वहीँ पूरी हो जाती हैं। अंडमान एक शांत जगह है, अपराधिक गतिविधियाँ या राजनैतिक हलचल बहुत कम होती है, इस कारण बहुत सारे यही रहना पसंद भी करते हैं। मेरे बगल सीट वाले एक युवक जो विद्यार्थी था, अंडमान के आदिवासियों और उनके रहन-सहन के बारे काफी कुछ बताया।
                                        सुबह चार बजे से लगातार बस चल रही थी, सिर्फ एक जगह लंच के लिए थोड़ी देर रुकी। अगर कोई और जगह होता तो आठ-दस घंटे बैठे-बैठे ऊब जाते, पर ये तो अंडमान था और सड़क के दोनों तरफ नए-नए नज़ारे देखने को मिल रहे थे- कहीं घने जंगल, कहीं गांव, कहीं खेत। द्वीपीय जन-जीवन एवं भूगोल देखने की स्वाभाविक जिज्ञासा ने मुझे कहीं बोर होने न दिया।

                                डेढ़ बज चुके. डिगलीपुर अब नजदीक ही था। यह भी रंगत के जैसा ही चालीस-पचास हजार की आबादी वाला एक क़स्बा है। लेकिन आश्चर्य इस बात की है की यहाँ काफी लोग बंगला बोलते हुए पाए गए। डिगलीपुर के मुख्य चौक पर बस ने हमें उतार दिया, लेकिन हमारी टिकट तो इससे आठ किमी आगे डिगलीपुर के जेट्टी एरियल बे तक की थी, बस वाले ने आगे लगे दूसरे बस में बैठने को कहा, क्योंकि एरियल बे जाने वाले कम संख्या में थे, और मुझे अगले दिन रॉस एंड स्मिथ ट्विन आइलैंड जाने के लिए नावों का पता करना था, इसलिए अगली बस में बैठकर एरियल बे उतर गया।

                                 जेट्टी पर कुछ लोगों से पूछताछ के दौरान पता चला की डिगलीपुर के एरियल बे जेट्टी से ही रॉस एंड स्मिथ ट्विन आइलैंड जाने के लिए प्राइवेट नावें चलती हैं। साथ ही बड़ी फेरियां जो पोर्ट ब्लेयर, रंगत आदि जाती है, वो भी इसी जेट्टी से प्रस्थान करती हैं। लेकिन बड़ी फेरियों का बुकिंग ऑफिस पीछे बस स्टैंड के पास ही है।
                  नाव का पता लगाने के बाद मुझे फिर से वापस बाजार की ओर ही जाना था, बस ढूंढने लगा। लेकिन बस हर पैतालीस मिनट में ही चलती  है। इंतज़ार करने का मन नहीं था। देखा की ऑटो भी चल रहे हैं, एक ऑटो वाले को पकड़ा और उसने बीस रूपये में बाजार पहुंचा दिया।

                        डिगलीपुर में होटल की कोई एडवांस बुकिंग नहीं की थी, क्योंकि यहाँ होटल बहुत कम संख्या में है, और सिर्फ महंगे वाले एक-दो ही इंटरनेट पर  उपलब्ध हैं। बाकि बाजार वाले इलाके में सस्ते लॉज तो खूब सारे हैं। जेट्टी के पास एक होटल दिखा था मुझे- होटल सैडल पिक, पर लोकेशन बाजार से दूर होने के कारण उसे अनदेखा कर दिया। अंडमान टूरिज्म का सरकारी होटल टर्टल रेजॉर्ट जेट्टी से भी आगे कालीपुर तट के पास है, बाजार से बीस किमी दूर, रूम का किराया छह सौ रूपये से शुरू है, पर दूर होने के कारण उसमें भी बुकिंग नहीं की थी। अब लॉज में रुकने के ही एकमात्र चारा बचा था, जिस जगह बस रुकी थी, सामने एक लॉज दिखा था- एम् वी लॉज, वहीँ चला गया, रूम का किराया सिर्फ तीन सौ रूपये ही था।

                           होटल की समस्या हल हो गयी, शाम के चार बज रहे थे। डिगलीपुर का बाजार ठीक-ठाक था, पोर्ट ब्लेयर जैसी भीड़-भाड़ नहीं थी। सड़क चौड़ी और नयी लग रही थी। यह अंडमान का सबसे उत्तरी छोर पर बसा हुआ शहर है, पर सबसे अधिक संख्या में पश्चिम बंगाल से आकर बसने वाले लोग हैं, उसके बाद तमिलनाडु के। हिंदी-बांग्ला-तमिल की त्रिवेणी है यहाँ पर। डिगलीपुर में सबसे अधिक प्रसिद्ध जगह जो घूमने लायक है- रॉस एंड स्मिथ आइलैंड, मुझे कल सुबह जाना था। अंडमान की सबसे ऊँची चोटी सैडल पिक भी इधर ही है, पर अकेले ट्रैक करने का कोई इरादा न था। कालीपुर तट का नाम भी सुन रखा था, जो जेट्टी से आगे है, शाम की बोरियत से बचने के लिए बस पकड़ी और उधर ही चला गया।

                 कालीपुर तट-जैसा नाम वैसा ही रंग-रूप। इस तट पर बालू का रंग काला है, पानी की लहर भी कमजोर ही है। हां. इस तट पर टर्टल नेस्लिंग यानि कछुओं के अंडे सहेज कर रखे जाते हैं, ताकि उन्हें कोई नुकसान न पहुंचा पाए। इस तट पर पाए जाने वाले कछुवों और उनके अण्डों के लिए विशेष इंतज़ाम किये गए हैं । एक विदेशी पर्यटक जो जर्मनी से आया था, उससे कुछ देर बात हुई। उसने कहा की वो 1979 से ही भारत की यात्रा करता आ रहा है, उसे भारत बहुत पसंद है। लॉन्ग आइलैंड जाने की उसकी इच्छा किसी कारणवश पूरी न हो पायी थी।

                 कालीपुर तट पर सूर्यास्त के साथ ही दिन की समाप्ति हुई, काफी देर तक बस का इंतज़ार करना पड़ा वापस बाजार तक जाने के लिए। डिगलीपुर के मुख्य चौक पर ही जरुरत के सारे सामान उपलब्ध थे, छोटा सा ही बाजार है। भोजन में दक्षिण भारतीय स्वाद बिल्कुल साफ़ पता चलता है, पर मछली अनिवार्य है। अंडमान में सभी जगह पराठे मांगने पर मैदे की बनी रोटी मिलती है, उत्तर भारतीय पराठे का कन्फ्यूजन मुझे बड़ी  देर तक रहा।  अगली पोस्ट में चलते हैं- रॉस एंड स्मिथ ट्विन आइलैंड।        
          
  अंडमान ट्रंक रोड और डिगलीपुर पर एक नजर:---

 पोर्ट ब्लेयर बस स्टैंड पर बसों का टाइम-टेबल



    अंडमान ट्रक रोड
 ट्रंक रोड पर पहली जलधारा- बाराटांग के पास


  अंडमान ट्रंक रोड- जलधारा पार करते हुए 
ऐसे जहाज पर ट्रकों, बसों व कारों को भी लादा जाता है!
मिडिल स्ट्रैट जेट्टी
 बाराटांग जेट्टी
 गाँधी घाट जेट्टी
उत्तरा जेट्टी
डिगलीपुर में आपका स्वागत है!
डिगलीपुर नहीं देखा, तो क्या देखा!


 कालीपुर तट- जैसा नाम, वैसा रंग


 मेरे साथी जर्मन मुसाफिर
 टर्टल नेस्लिंग

 इनके अंदर कछुओं के अंडे सहेज कर रखे हुए हैं

इस हिंदी यात्रा ब्लॉग की ताजा-तरीन नियमित पोस्ट के लिए फेसबुक के TRAVEL WITH RD पेज को अवश्य लाइक करें या ट्विटर पर  RD Prajapati  फॉलो करें साथ ही मेरे नए यूंट्यूब चैनल  YouTube.com/TravelWithRD भी सब्सक्राइब कर लें। 


***अंडमान के अन्य पोस्ट***

  1. शुरुआत अंडमान यात्रा की...  ( Trip to Andman: Jamshedpur-Kolkata to Port Blair)
  2. अंडमान यात्रा: सेल्युलर जेल (Trip to Andman: Cellular Jail)
  3. अंडमान यात्रा: लकड़ियों की जादूगरी- चाथम आरा मील और कोर्बिन तट (Chatham Saw Mill and Corbyn's Cove Beach- Port Blair)
  4. अंडमान यात्रा: नार्थ बे तट और भूतपूर्व पेरिस ऑफ़ ईस्ट- रॉस द्वीप (North Bay and Ross Island, Port Blair)
  5. अंडमान यात्रा: नील द्वीप पर पैदल भ्रमण- एक नीला एहसास (Neil Island- A Blue Heaven)
  6. नील से हेवलॉक- रंग-बिरंगा राधानगर तट (Neil to Havelock- The Colourful Radhanagar Beach)
  7. अंडमान ट्रंक रोड: समंदर से गुजरने वाले हाईवे पर सफर-पोर्ट ब्लेयर से डिगलीपुर (Andman Trunk Road: Highway which crosses the sea-Port Blair to Diglipur)
  8. रॉस एंड स्मिथ- जुड़वाँ टापू पर दो समुद्र तटों का मिलन (Ross and Smith Twin Island- Meeting of two sea beaches)  
  9. अंडमान का कार्यक्रम कैसे बनायें? (How to plan Andman Trip)
  10. चिड़ियाटापू और मुंडा पहाड़ तट: समंदर में पहाड़ों पर सूर्यास्त! (Chidiyatapu and Munda Pahad Beach: Sunset in the hilly ocean)
  11. वंडूर तट और दुनिया के सबसे अच्छे कोरल रीफ वाला जॉली बॉय द्वीप (Wondoor Beach and Jolly Bouy Island: One of the best Coral Reefs of the World)
  12. रंगत की काली रात और सुबह बाराटांग में चूने पत्थर की सफ़ेद गुफाएं (Night stay at Rangat and Lime Stone Caves of Baratang)

Comments

  1. जिस तरह नाॅनस्टाॅप बस यात्रा , उसी तरह धारा प्रवाह वृत्तांत ।
    अकेले होने का कुछ कुछ खटक रहा है ।

    ReplyDelete
  2. यह पोस्ट बहुत धार दार है सीधे दिल दिमाग से घुस जाता है ।

    ReplyDelete
  3. bahut khuusurat jankari se bharpur

    https://rahichaltaja.blogspot.in

    ReplyDelete
    Replies
    1. धन्यवाद अभयानंद जी!

      Delete
  4. भाई ग़ज़ब यात्रा करवा रहे हो अंडमान की और जरावा का फोटो नहीं लिया

    ReplyDelete
  5. धन्यवाद प्रतीक भाई, जरावा का फोटो लेना वैसे तो गैरकानूनी है, और चलती बस से अचानक फोटो लेना बहुत मुश्किल भी!

    ReplyDelete
  6. भाई जी , गजब बिलकुल आश्चर्यजनक आपका लेख पढ़कर तो मेरा मन मचलने लगा है जाने के लिए,

    ReplyDelete
    Replies
    1. बहुत बहुत धन्यवाद भाई जी, जरुर जाईये एक बार अंडमान! बहुत बहुत शुभकामनाये!!!

      Delete
  7. गज़ब की जगह दिखाई है आपने आरडी भाई ! जबरदस्त ! और वृतांत भी बहुत सटीक और सूचनाप्रद ! लिखा भी है एक जगह -डिगलीपुर नहीं देखा तो क्या देखा !! मजा आया और मैं दृश्य को वीडियो में देखकर अति प्रसन्न हुआ जिसमें वो बस लादकर ले जाते हैं जहाज में !!

    ReplyDelete
  8. बहुत ही शानदार पोस्ट आर डी भाई... मजा आ गया पढकर

    सच्ची में बहुत ही बढ़िया यात्रा करवाया आपने अंडमान की

    ReplyDelete
    Replies
    1. बहुत बहुत शुक्रिया रितेश जी

      Delete

Post a Comment

Popular posts from this blog

अंडमान यात्रा का कार्यक्रम कैसे बनायें? (How to plan Andman Trip)

दोस्तों अब तक मैंने अंडमान के लगभग सारे मुख्य स्थानों के बारे अपना यात्रा वृतांत आपके साथ साझा कर दिया है। फिर भी संक्षिप्त रूप में एक और पोस्ट लिख रहा हूँ ताकि आपको भी अंडमान का कार्यक्रम बनाने में कुछ मदद मिल सके। अंडमान मुख्य भूमि से काफी दूर है, इसलिए ढेर सारे लोगों के मन में ये दुविधा जरूर रहती है की अंडमान कैसे जाएँ, कार्यक्रम कैसे बनायें, अंडमान तो खर्चीला होगा आदि आदि।

Which is the best berth in trains: Lower, Middle or Upper?

Which is the best berth in trains? You have mainly three choices in trains: lower, middle and upper berths. There are also side lower and side upper berths. In this post, we will be going to discuss about advantages and disadvantages of different types of train berths. However, different types of travelers may need or prefer a particular type of berth according to their ages, interests or physical conditions. Top 5 Flight Booking Sites in India for Domestic & International flights As you already know that there are many types of coaches in Indian trains like general, 2nd seating, AC chair car, sleeper, 3rd AC, 2nd AC and 1st AC. The general, 2nd seating or AC chair car coaches do not have the facility of sleeping. They are best suitable for day time journey. Thereafter, sleeper, 3rd AC, 2nd AC and 1st AC coaches have the facility of sleeping and comfortable for long and very long overnight journeys. The berths orientation in the sleeper and 3rd AC coaches are exactly same, only dif...

A Travel Guide To Auli For 4 Days

This guide will respond to every one of your inquiries regarding this spot, from Auli’s climate, how to reach from Delhi, best to visit it and settlement. One fascinating thing about Auli is that hereyou will get best of both the words – snow peaked high mountains andfurthermore apple plantations and pine trees. During winters you can appreciatesnow all around the spot and during summers you can get lost in the midst ofthe pleasant mountains. Auli is acclaimed as a skiing spot of India, which is associated with two cable car running – one from Joshimath and another in Auli itself. In here, you will almost certainly observe the snow-peaked magnificence of Garhwal Himalayas, alongside Nanda Devi, Mana Parvat and Kamat Kamet. My go to locations for stay was always youth hostels . Because they were a comfortable, cheap and thebest thing was I always meet some of the co-travelers and they share theiramazing stories which feel awesome. 5 Interesting Things to Know About Auli There are a few ...