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मिशन लद्दाख-2: दिल्ली से मनाली (Mission Ladakh: Delhi to Manali)

                      22 जुलाई 2016, तो लद्दाख के लिए सारी तैयारियाँ पूरी करने के बाद आखिर यह दिन आ ही गया, और यात्रा के पहले चरण में टाटानगर से हम चार बन्दे ट्रेन से दिल्ली के लिए रवाना हुए, जबकि तीन बन्दे दो बाइक में एक दिन पहले ही सीधे बाइक से रवाना हो चुके थे, और तब तक इलाहाबाद पार कर चुके थे।
गुडगाँव से भी चार लोग और हमारे साथ जुड़ने वाले थे, जो कार से जाने वाले थे। हमारी दो बाइक दो दिन पहले ही ट्रेन से पार्सल कर दी गयी थी और दिल्ली पहुँच चुकी थी, जिन्हें गुडगाँव वाले दोस्तों ने स्टेशन से छुडवा कर अपने पास रख लिया था।

बाइक से जाने की तैयारी में 
  1. मिशन लद्दाख-1: तैयारियाँ (Preparing for Mission Ladakh)
  2. मिशन लद्दाख-2: दिल्ली से मनाली  (Mission Ladakh: Delhi to Manali)
  3. मिशन लद्दाख-3: मनाली में बाइक का परमिट (Mission Ladakh: Obtaining Bike Permit in Manali)
  4. मिशन लद्दाख-4: मनाली से भरतपुर (Mission Ladakh: Manali to Leh via Rohtang Pass-Keylong-Jispa-Darcha-Zingzingbar-Baralachala-Bharatpur) 
  5. मिशन लद्दाख-5: भरतपुर से लेह (Mission Ladakh: Bharatpur-Sarchu-Nakeela-Biskynala-Lachungla-Pang-Debring-Tanglangla-Upshi-Leh
  6. मिशन लद्दाख-6: शे गुम्पा, लेह महल, शांति स्तूप और हॉल ऑफ़ फेम (Mission Ladakh: Leh Palace and Hall of Fame)
  7. मिशन लद्दाख-7: मैग्नेटिक हिल का रहस्य और सिंधु-जांस्कर संगम (The Mysterious Magnetic Hill & Sindhu-Janskar Confluence)
  8. मिशन लद्दाख-8: रेंचो स्कूल (Mission Ladakh-8: Rancho School)
  9. मिशन लद्दाख-9: चांगला से पेंगोंग (Chang La to Pangong Tso)
  10. मिशन लद्दाख-10: पेंगोंग से नुब्रा और खारदुंगला (Pangong to Nubra and Khardungla)                         
   राजधानी एक्सप्रेस जैसी महँगी ट्रेन में बैठने का भी यह मेरा पहला ही मौका था। यह ट्रेन हमें मात्र अठारह घंटे में ही दिल्ली पहुँचाने वाली थी, जबकि दूसरी ट्रेनें चौबीस घंटे लेती हैं। राजधानी जैसी ट्रेनों में बैठने का एक बड़ा फायदा यह है की खाने-पीने की कोई चिंता नहीं होती, लेकिन किराया भी अधिक देना पड़ता है। फिर भी भारतीय रेल होने के कारण दूसरी आम ट्रेनों की तरह यह भी नियत समय से आधे घंटे लेट चल रही थी।  ट्रेन में सिर्फ लद्दाख की कौतुहल भरी बाते होती रही, खुली आँखों से हम चारों लद्दाखी सपने में डूब चुके थे, सफ़र बड़ी तेजी से आगे बढ़ रहा था। ट्रेन में सिर्फ एक रात बीती और अगले ही दिन सुबह साढ़े ग्यारह बजे हम नई दिल्ली स्टेशन पर थे।

                           नई दिल्ली से एक टैक्सी लेकर एक घंटे के अन्दर हम गुडगाँव वाले चार दोस्तों के पास गए जिनके पास हमारी दो बाइक हमसे पहले ही पहुँच चुकी थी। अब कुल मिलाकर यहाँ हम आठ थे, दो कारें थीं और दो बाइक। एक कार फोर्ड फिगो थी जबकि दूसरी वाक्स्वोगन पोलो। एक बाइक बुलेट 350 सीसी थी जिसे एक साथी विवेक चलाने वाले थे, जबकि दूसरी 500 सीसी की थी, जिसे मैं चलाने वाला था। तीन बन्दे जो सीधे जमशेदपुर से ही निकले थे, वे उस वक़्त अपने यात्रा के तीसरे दिन चंडीगढ़ पार कर चुके थे। गुडगाँव में हमने अपना लगेज बाइक में बाँधा, कार वालों ने कार में रखा। कार लगेज से बिल्कुल पैक हो चुकी थी।

हमने अपनी गाड़ियों में मिशन लद्दाख का एक सांकेतिक झंडा भी लगाया जिसपर लिखा था-
"The Mountains are calling and I must go!"

                            यह जो 500 सीसी की बुलेट थी, वो मेरी नहीं, बल्कि ग्रुप के ही एक दोस्त की थी, लेकिन वो महाशय अब बाइक पर आना ही नहीं चाहते थे, कार में बैठकर पूरी तरह से बाइक मुझे सौंप दिया। बुलेट जैसी भारी भरकम बाइक चलाने के मेरा कोई अनुभव भी नहीं था, पहली बार तो बैठते ही ऐसा लगा की शायद नहीं हो पायेगा मुझसे, मुझे तो पल्सर जैसी बाइक चलाने की आदत है। लेकिन मात्र एक दो किलोमीटर इसे दौड़ाने के बाद ही इसपर मेरे हाथ बैठ गए। बुलेट को अन्य डेढ़ सौ सीसी बाइक की तरह तेज दौड़ाने पर ही इसमें तेज कम्पन पैदा हो जाता, इसीलिए अधिकतम रफ़्तार साठ-सत्तर की ही रही। वैसे लद्दाख जाने के लिए बुलेट की अनिवार्यता को मैं भी नहीं मानता।

गुड़गांव/दिल्ली से बिलासपुर तक का सड़क मार्ग

                   तो अब गुडगाँव से हमारा असली मिशन लद्दाख शुरू हो चुका था। दोनों कारों में तीन-तीन और दोनों बाइक में एक-एक कर हम मनाली की ओर निकल पड़े। दिल्ली की ट्रैफिक का आलम यह था की शहर से बाहर निकलने में ही कम से कम तीन घंटे लग गए, तब जाकर हम NH44 पर अपनी ठीक-ठाक गति में आ सके, और तब तक शाम के चार बज चुके थे। 
    चूँकि दिल्ली से ही निकलने में काफी देर हो चुकी, दिन भी आधा निकल ही गया, इसीलिए उसी दिन मनाली पहुँच पाना अब दूभर लग रहा था। दिल्ली से मनाली कम से कम बारह घण्टे तो लगने ही थे।
         दिल्ली से सोनीपत पार कर हमने मुरथल में एक छोटा सा ब्रेक लिया फिर लगातार चलते ही रहे। हम हरियाणा की धरती में दौड़ रहे थे। पानीपत, करनाल, कुरुक्षेत्र होते हुए शाम छह बजे के आस पास हमने अम्बाला में फिर एक ब्रेक लिया। इस वक़्त भी इधर अब तक अँधेरा नही हुआ था, जबकि हमारे यहाँ तो अँधेरे की शुरुआत हो जाती है। 
          अम्बाला से मनाली की ओर बढ़ने के लिए चंडीगढ़ प्रवेश करने की जरुरत न थी, इसलिए हमने बायपास मार्ग खरड़ से रूपनगर की ओर प्रस्थान किया। इस बाईपास सड़क को खोजने के दौरान भी हमलोगों ने भटक कर आधे घंटे का वक़्त बर्बाद किया।  
      जब हम चंडीगढ़ के बाहर-बाहर इस प्रकार गुजर रहे थे, तब रात के आठ-नौ बज चुके थे। मनाली यहाँ से अभी भी तीन सौ किमी दूर था, अब तो उसी रात पहुंच पाना नामुमकिन ही था, और जमशेदपुर से सीधे चलने वाले बाइकर उस रात चंडीगढ़ से 120 किमी आगे और मनाली से लगभग 180 किमी पहले बिलासपुर में रुकने वाले थे। इसीलिए हमें भी किसी प्रकार उस रात बिलासपुर तक तो पहुंचना ही था।

                                रात के अँधेरे में अब बाइक चलाना काफी जोखिम भरा हो चुका था। भारी वाहनों के कारण उडती धूल रास्तों को ओझल कर देती थी। बड़े ग्रुप में यात्रा करने के कुछ फायदे हैं तो कुछ नुकसान भी हैं। अगर ग्रुप बड़ा न होता तो अब तक हम और आगे निकल चुके होते। आठ-नौ घंटे से हम गाड़ी दौड़ा रहे थे, पेट में चूहे भी दौड़ लगा रहे थे। अँधेरे में जिस ढाबे पर हमने डिनर किया, जगह का नाम तो मुझे अब ठीक से याद नही, शायद किरतपुर साहिब ही रहा होगा। यहाँ भी लगभग एक-डेढ़ घंटे हमने ब्रेक ले ही लिया।

                                    रात के दस-ग्यारह बजे अब हम हिमाचल की धरती पर कदम रखने वाले थे, लेकिन हिमाचल के होने का आभास मुझे तब हुआ जब पहाड़ों के टेढ़े-मेढे रास्ते शुरू हुए। रास्ते पर अब ट्रैफिक बहुत कम हो चुका था, सिर्फ भारी वाहन ही थे। रात्रिकाल में इस प्रकार अनजाने-अजनबी पहाड़ों पर बाइक चलाना एक अभूतपूर्व अनुभव था। जैसे-जैसे ऊंचाई बढती गयी, कान भी सुन्न पड़ने लगे, घाटियों में टिमटिमाते  असंख्य बिजली बत्तियों के नज़ारे, बलखाती सड़कें- ये सारा कुछ रात के वक़्त देखना, ऊपर से मस्तमौले अंदाज़ में बाइक का सफ़र- ये सब कुछ काफी रोमांचक था। इससे पहले मैंने सिर्फ समतल रास्तों पर ही बाइक चलायी थी, जिसमें जमशेदपुर से दीघा (पश्चिम बंगाल) तक की करीब तीन सौ किमी यात्रा सबसे लंबी रही थी, लेकिन  पहली बार हिमालय में बाइक चला रहा था, वो भी रात के अँधेरे में। अब तो अगले दस दिनों तक इन पहाड़ों में ही रहना था।

              अपने साथ चलने वाली दो कारों के साथ हम दो बाइकरों ने समय और गति का तालमेल बैठाते हुए जिस वक़्त बिलासपुर प्रवेश किया, रात के दो बज रहे थे। यहाँ पहले से हाजिर थे- जमशेदपुर से सीधे बाइक लेकर आने वाले कमल और उनके दो साथी। लद्दाख जाने वाली ग्यारह लोगों की पूरी टीम बिलासपुर में ही एक हो पाई। रात्रि विश्राम के लिए बिलासपुर में होटल की कोई दिक्कत नही हुई। 

                 दिल्ली से बिलासपुर तक आज लगभग चार सौ किमी की बाइक यात्रा हो चुकी थी। बाइक चलाना तो था लद्दाख के लिए, पर इस परिस्थिति का अंदाजा कभी न था। मनाली पहुँचने की हड़बड़ी इसलिए भी बढ़ गयी थी, क्योकि अगले दिन हमें वहां बाइक की परमिट भी बनवानी थी, और अगला दिन रविवार था, रविवार को परमिट कार्यालय दोपहर बारह बजे तक ही खुला रहता है, इसीलिए हर हाल में अगले दिन कम से कम सुबह ग्यारह बजे तक मनाली पहुँच जाने का लक्ष्य था।  

 इस पोस्ट के लिए ज्यादा कुछ तस्वीरें तो नही हैं--

बाइक में सामान बांधते हुए
रास्ते में एक ब्रेक 

      लद्दाख सीरीज अन्य पोस्ट-
  1. मिशन लद्दाख-1: तैयारियाँ (Preparing for Mission Ladakh)
  2. मिशन लद्दाख-2: दिल्ली से मनाली  (Mission Ladakh: Delhi to Manali)
  3. मिशन लद्दाख-3: मनाली में बाइक का परमिट (Mission Ladakh: Obtaining Bike Permit in Manali)
  4. मिशन लद्दाख-4: मनाली से भरतपुर (Mission Ladakh: Manali to Leh via Rohtang Pass-Keylong-Jispa-Darcha-Zingzingbar-Baralachala-Bharatpur) 
  5. मिशन लद्दाख-5: भरतपुर से लेह (Mission Ladakh: Bharatpur-Sarchu-Nakeela-Biskynala-Lachungla-Pang-Debring-Tanglangla-Upshi-Leh
  6. मिशन लद्दाख-6: शे गुम्पा, लेह महल, शांति स्तूप और हॉल ऑफ़ फेम (Mission Ladakh: Leh Palace and Hall of Fame)
  7. मिशन लद्दाख-7: मैग्नेटिक हिल का रहस्य और सिंधु-जांस्कर संगम (The Mysterious Magnetic Hill & Sindhu-Janskar Confluence)         
  8. मिशन लद्दाख-8: रेंचो स्कूल (Mission Ladakh-8: Rancho School)
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Comments

  1. बहुत अच्छा लिख रहे हैं,लद्दाख़ मै भी अगले वर्ष बाइक से जाना चाहता हूँ,अकेले,उस समय आपके द्वारा दी गयी जानकारी काम आएगी।धन्यवाद्

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  2. बहुत अच्छा लिख रहे हैं,लद्दाख़ मै भी अगले वर्ष बाइक से जाना चाहता हूँ,अकेले,उस समय आपके द्वारा दी गयी जानकारी काम आएगी।धन्यवाद्

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  3. बहुत अच्छा राम भाई फ़ोटो अच्छे है

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  4. राम भाई ट्रेन से बाइक आपने किस प्रकार बुकिंग की और कितना खर्चा पड़ा ।
    पहाड़ो पर आपका बाइक से पहली यात्रा थी क्या ?
    यात्रा लेख सही चल रहा है आगामी पोस्ट का इंतजार ।

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    1. ट्रेन से बाइक बुकिंग के लिए आपको रेलवे के लगेज या पार्सल बुकिंग काउंटर पर संपर्क करना होगा। बाइक की टंकी से पेट्रोल खाली करना होगा, पैकिंग चार्ज कुछ लगेगा, बाकी गाड़ी के वजन एवं मूल्य के हिसाब से किराया तय होगा। हमें लगभग 3000 एक तरफ का किराया लग गया था।
      और ये पहाड़ों पर मेरी पहली ही यात्रा थी।
      धनयवाद।

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  5. राम भाई ट्रेन से बाइक आपने किस प्रकार बुकिंग की और कितना खर्चा पड़ा ।
    पहाड़ो पर आपका बाइक से पहली यात्रा थी क्या ?
    यात्रा लेख सही चल रहा है आगामी पोस्ट का इंतजार ।

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  6. बहुत मस्त यात्रा होने वाली है ये , ऐसा अंदाज़ा होने लग रहा है ! अभी तक तो सही जा रहे हो आरडी भाई

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  7. पहाड़ो पर पहली बार बाइकिंग और वो भी रात के अँधेरे में, गजब।

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  8. शानदार यात्रा 👌आगाज इतना हसीन है तो अंजाम तो और भी बढ़िया होगा । लगे रहो मुन्ना भाई हम साथ ही है

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    1. बहुत बहुत धन्यवाद बुआ जी! आपका आशीर्वाद हमेशा साथ रहेगा!

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  9. maine change miss kar diya kas aapse ek sal pahle jude hote to hum bhi chale jate aapke sath, acha koi baat nahi phir mauka milega kahi jane ka to jaroor jayege

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  10. रात के अंधेरे में डगमगाते पहाड़ी रास्ते पर बाइक चलाने का भरपूर लुफ्त उठाया आपने राम भाई...

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