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मगध की पहली राजधानी- राजगीर से कुछ पन्ने और स्वर्ण भंडार का रहस्य (Rajgir, Bihar)

जैसा की पिछले पोस्टों से विदित है की बिहार में पर्यटन की धुरी बोधगया-राजगीर-नालंदा के इर्द गिर्द ही घूमती है। राजगीर का प्राचीन नाम राजगृह था जो कभी मगध की राजधानी हुआ करती थी, लेकिन बाद में मौर्य शासक अजातशत्रु द्वारा मगध की राजधानी पाटलिपुत्र या आधुनिक पटना स्थानांतरित किया गया। हालाँकि,
किस मौर्य शासक ने पाटलिपुत्र को राजधानी बनाया, इसमें जरा संशय बरकरार है। साथ ही बौद्ध और जैन धर्म से सम्बंधित ऐतिहासिक स्मारक भी राजगीर का महत्व बढ़ा देते हैं।

विश्व शांति स्तूप
                          गया से लगभग सत्तर किलोमीटर दूर नालंदा जिले में चारों और से हरी-भरी पहाड़ियों से 
  1. बोध गया: एक एतिहासिक विरासत (Bodh Gaya, Bihar)
  2. दशरथ मांझी: पर्वत से भी ऊँचे एक पुरुष की कहानी (Dashrath Manjhi: The Mountain Man)
  3. मगध की पहली राजधानी- राजगीर से कुछ पन्ने और स्वर्ण भंडार का रहस्य (Rajgir, Bihar)
  4. नालंदा विश्वविद्यालय के भग्नावशेष: एक स्वर्णिम अतीत (Ruins of Nalanda University)
  5. कुम्भरार: पाटलिपुत्र के भग्नावशेष (Kumbhrar: The Ruins of Patliputra)
घिरा राजगीर एक छोटा सा शहर है। अक्सर इधर शुष्क मौसम के कारण धूप बड़ी तेज होती है, इसीलिए ठण्ड का मौसम ही बिहार विचरण हेतु आदर्श माना जा सकता है। राजगीर पटना और गया से रेलमार्ग द्वारा सीधे जुड़ा है। लेकिन समय का संतुलन नहीं रहने के कारण हमें गया से राजगीर बस द्वारा ही तय करना पड़ा, 

जो की काफी जद्दोजहद वाली यात्रा रही, कारण यह की बिहार की सार्वजनिक बसों में जबरदस्त भीड़ रहती है, हर दो मिनट पर बस का रुकना काफी उबाऊ हो जाता है, मात्र सत्तर किलोमीटर तय करने में तीन घंटे लग जाते हैं। हाँ, सड़क काफी अच्छी स्तिथि में है। गया से राजगीर दशरथ मांझी के गाँव यानि गेहलौर होकर भी जाया जा सकता है।
                      बिहार में राजगीर ही एक ऐसा इलाका है जहाँ आपको पहाड़ देखने मिलेंगे वरना समूचा बिहार मैदानी है। राजगीर सात पहाड़ियों से मिलकर बना है जिनके नाम इस प्रकार हैं- छठगिरि, रत्नागिरी, शैलगिरि, सोनगिरि, उदयगिरि, वैभरगिरि एवं विपुलगिरि। हर पहाड़ी पर कोई न कोई जैन, बौद्ध या हिन्दू मंदिर है। इस प्रकार राजगीर इन तीनों धर्मों का तीर्थ बन जाता है।

                      राजगीर अपने अंदर अनेक ऐतिहासिक पहलुओं को समेटा हुआ है। इस शहर का रख रखाव कदाचित बिहार जैसा नहीं जान पड़ता, बल्कि किसी अन्य विकसित पर्यटक स्थल जैसा लगता है। सड़कें बिलकुल नयी नयी और साफ़-सुथरी। दिलचस्प तथ्य यह है की यहाँ आज भी एक घोड़े से खींचे जाने वाले टमटम चल रहे हैं, और टमटम वाले संगठन बना कर ऑटो वालों को चलने नहीं देते। 

                    राजगीर बस स्टैंड पर एक टमटम वाले से मोल-तोल कर चार सौ रूपये में राजगीर भ्रमण का कार्यक्रम तय हुआ। राजगीर में छोटे-छोटे ऐतिहासिक स्थल इतने भरे पड़े है की अगर आप एक लिस्ट बना कर ना चलें, तो कुछ छूट भी सकते हैं। हमारे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ, टमटम वाले ने भी ध्यान नहीं दिया।

         सबसे पहले हमारा रुख हुआ राजगीर के प्रसिद्द सोन भंडार की ओर, जो वास्तव में "स्वर्ण भंडार" है। कहा जाता है की इस गुफा में मगध सम्राट बिम्बिसार का सोने का खजाना छुपा हुआ है। गुफा के प्रवेश द्वार पर ही एक छोटा सा कक्ष है जिसे गुफा की सुरक्षा करने वाले सैनिकों के लिए चट्टान काट कर बनाया गया था। खजाने तक जानेवाले रास्ते को एक चट्टान से बंद कर दिया गया था, जिसे आज तक कोई खोल न पाया है। इस कक्ष की दीवार पर शंख लिपि में रास्ता खोलने का तरीका लिखा हुआ है, लेकिन शंख लिपि आज तक किसी के द्वारा न पढ़े जा सकने के कारण आज तक इसे कोई समझ न पाया है। अंग्रेजों ने भी इस दरवाजे को तोप से उड़ाने की कोशिश की, लेकिन सफल न हुए। आज भी यहाँ तोप के निशान मौजूद हैं। एक बार वैज्ञानिकों ने पुरे गुफे के रहस्य से पर्दा हटाने के लिए इसे बम से उड़ाने के बारे सोचा था, लेकिन यहाँ के चट्टानों में गंधक जैसे ज्वलनशील तत्त्व पाये जाने के कारण कोई जोखिम नहीं लिया गया। एक स्कूली बच्चों का ग्रुप यहाँ भ्रमण करने आया था जिन्हें एक वृद्ध स्थानीय साहित्यकार गुफा का इतिहास समझा रहे थे। हमने भी पीछे खड़े होकर सारा कुछ सुन लिया था, इसीलिए गुफा के बारे इतना कुछ लिख पाना संभव हो सका है। 

                                     आगे बढ़ते हुए सोन भंडार से मात्र एक किलोमीटर की दूरी पर एक और मगध सम्राट जरासंध का अखाड़ा है, कहा जाता है की वे यही युद्ध का अभ्यास करते थे। आज यहाँ सिर्फ कुछ टूटे-फूटे दीवार और महज कुछ चट्टान ही देखने के लिए बाकि रह गए हैं।

                                     चलते चलते अचानक हमें नालंदा विश्वविद्यालय दिख जाता है, लेकिन यह वो नहीं जो आप सोच रहे हैं। दरअसल राजगीर में फिर से एक नए भवन में नयी नालंदा यूनिवर्सिटी शुरू की गयी है, जबकि पुराने नालंदा विश्वविद्यालय के भग्नावशेष यहाँ से तेरह किलोमीटर दूर है।

                                      वीरायतन, कुछ ही दूरी पर है, जहाँ महावीर की पूरी जीवनी छोटे-छोटे मूर्तियों और कृत्रिम कलाकृतियों से दर्शाया गया है।  फोटो  खींचने की अनुमति नहीं मिलने के कारण उन्हें दिखा पाना संभव नहीं है। लेकिन सभी कलाकृतियां एक से बढ़कर एक रंग-बिरंगे और देश के विभिन्न हिस्सों के कलाकारों ने यहाँ योगदान दिया है। खाने वाले ब्रेड का बना एक नमूना काफी अद्भुत है। 

                                       अब ले चलते हैं एक दुर्भाग्यपूर्ण स्मारक बिम्बिसार जेल की ओर। दुर्भाग्यपूर्ण इसीलिए की यह एक पुत्र द्वारा अपने ही पिता को कैदी बना कर रखने की निशानी है। अजातशत्रु ने धन और राज-पाठ के झगडे में अपने पिता बिम्बिसार को यहाँ कैद कर रखा था जिसके अवशेष के रूप में चट्टानों का एक घेरा आज भी मौजूद है। सैकड़ों वर्ष पुराने लोहे के शिकंजे भी स्थल से बरामद हुए हैं, जो की कही और रखे गए हैं। गौरतलब है की बिम्बिसार ने खुद ही  कारागार स्थल चुनाव किया था ताकि वो गिद्धकुट पर्वत पर रोजाना बुद्ध को जाते हुए देख सके। शान्ति में विश्वास रखने के कारण उसने पुत्र की धृष्टता भी बर्दाशत कर लिया। 

                                  राजगीर जिस चीज के लिए सबसे ज्यादा जाना जाता है वो है यहां के गर्म जल के कुण्ड। राजगीर के चट्टानों में कुछ ऐसे तत्व पाये जाते हैं जो इन कुंडों के गर्म होने के राज हैं। कुण्ड में नहा कर लोगों को तृप्ति का एहसास होता है, कुण्ड-जल चर्मरोगनाशक भी माना जाता है। ब्रह्म कुण्ड और मखदूम कुण्ड दो प्रसिद्द कुण्ड हैं जहाँ पानी का तापमान 45℃ तक होता है। ज्यादातर कुंडों के इर्द-गिर्द कोई न कोई मंदिर जरूर है।

                 सफ़र के सबसे अंतिम पड़ाव में हमने राजगीर के विश्व शांति स्तूप की ओर रुख किया जो एक पहाड़ी पर स्थित है। यहाँ गौतम बुद्ध ने सैकड़ों वर्षों पूर्व अपने अनुयायियों को सिख दी। इस स्तूप तक जाने के लिए रोपवे या केबल कार उपलब्ध है।  रोपवे का एक टिकट साठ रूपये का था। आसपास कुछ दुकानें और जलपानगृह भी थे। मार्च ऑफ-सीजन होता है इसीलिए रोपवे चढ़ने के लिए लाइन ज्यादा लंबी न थी। राजगीर का रोपवे मुझे कुछ अलग लगा क्योंकि यहाँ एक कार में एक ही सीट है, जबकि दूसरे हिल-स्टेशनों के केबल कार में एक साथ चार या पांच लोग बैठ सकते हैं। कुल मिलाकर राजगीर का रोपवे भी अब ऐतिहासिक हो चला है, वर्षों से चलता आ रहा, लेकिन आधुनिक बनाने का प्रयास नहीं किया गया। शांति स्तूप बड़ा ही साफ़-सुथरा है और इसे जापान की मदद से बनाया गया था। पहाड़ी की इस चोटी पर आकर आप चारों ओर सभी पहाड़ियों के नज़ारे और राजगीर शहर का एक हिस्सा देख सकते हैं।

                             राजगीर के इन सभी स्थलों का भ्रमण करने में हमें मुश्किल से तीन-चार घंटे लगे, फिर भी कुछ स्मारकों तक नही पहुँच सके। मार्च के महीने में हलकी फुल्की गर्मी भी शुरू हो ही चुकी थी, फिर भी ज्यादा परेशानी नही हुई। शुष्क मौसम के साथ अब हमारी राजगीर यात्रा अब यही समाप्त होती है, अगली पोस्ट में चलेंगे नालंदा विश्वविद्यालय के भग्नावशेष की ओर।
    चलिए अब कुछ फोटो हो जाय-
सोन भंडार 






 एक स्थानीय बुजुर्ग इतिहासकार

बिम्बिसार जेल  



 वेणु वन 







अब चलें राजगीर के विश्व शांति स्तूप की ओर 










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Comments

  1. शांति स्तूप, सोन भंडार जबरदस्त है

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  2. धन्यवाद हर्षिता जी

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  3. वैसे उदयन (अजातशत्रु के पुत्र ) ने पाटलीग्राम को अपनी राजधानी बनाया था । उसके नन्द, मोर्य , शुंग से लेकर गुप्त तक पाटलिपुत्र अनवरत राजधानी रही । वैसे शानदार यात्रा विवरण ।

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  4. राजगीर को इतने करीब से देखना अच्छा लगा आरडी जी ! जब गया में था तो जाने का मन था लेकिन समय अभाव के कारण संभव नहीं हो पाया ! नालंदा विश्वविद्यालय के अवशेष देखना कोतुहल पैदा करता है !! बढ़िया पोस्ट रही आपकी

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    Replies
    1. कोई बात नहीं योगीजी, अगली बार जब भी बिहार आयें, राजगीर अवश्य पधारें. अगली पोस्ट नालंदा की ही होगी. पोस्ट की तारीफ का आपका बहुत बहुत शुक्रिया.

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    3. This comment has been removed by the author.

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  5. Bhut khushi mili aap ki post padh kr

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